Sunday, 21 July 2013

बालिग होने के लिय कितना दुःख बर्दास्त करना पडता है इसका एहसास ईश्वर  ने आखिर करा ही दिया लेकिन अभी सही मायने  में मैं बालिग नहीं हुआ  था वरना फुट फुट कर रोता बिलखता नहीं  संयमित रहता
दुसरे को धैर्य  दिलाता ,अपने कर्तवय को आंसू पी  कर करता।  सँभालने  में कुछ वक्त लगा आखिर बालिग हो ही गया l माँ  का एक सड़क हादसा में चोट लगने के बाद पटना  पहुँचते पहुँचते साँस की गति रुक गयी ठीक इसके छ्ठे  दिन बाबूजी का गुजरना जैसे लग रहा था की नियति पटकथा लिख रहा हो और हम सब तमाशविन बन सब कुछ देखने के लिए विवश हों .नियति के आगे कितना  बेबश है आदमी ! खुद को संभालना कठिन था पंडित  लोग विवेचना में व्यस्त थे कि अब श्राद्ध -कर्म एक हो या अलग अलग और मै  बुजुर्ग लोगों में बाबूजी / माँ को तलाश रहा था जो आगे छाया  दे जिनके समीप जाने पर शीतलता मिले lबाबूजी के एक मित्र ने डबडबायी आँखों से कहा  पिताजी जाते जाते तुम लोगो पर उपकार करते गये अब एक ही खर्च में दोनों भोज हो जायेगा l श्राद्ध कर्म के बाद लगा की मेरे उपर से माता -पिता का छत्र नहीं रहा यानि बालिग हो गया l इस संसार में अब ओ नहीं रहे उनकी याद ही अब मेरा संबल होगा सूनापन कुछ कहता है उनसे फिर मुलाकात नहीं होगी ,बात नहीं होगी उस सूनापन को शायद भर नहीं पायूँगा लेकिन जिन्दगी को जीना है हंस कर  जिंदादेल्ली  के  साथ ,भाई चारे के साथ ,मोहब्बत  के साथ येही तो सची श्रधान्जली होगा ,क्या सचमुच मैं बालिग  हो गया ! 

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