मैं अपने शहर को लेकर एक सपना देखा !! चौरी सड़क ,फूटपाथ ,सड़क के किनारे लंप पोस्ट ,दोनों तरफ छोउंह दार और फूलों का पेड़ , बगल से गुजरती ढकी हुई नाली ,साफ़ सुथरा परिवेश ,कुछ दुरी पर पार्क ,2-3 किलो मीटर पर स्कूल /बाजार प्रांगन / स्वास्थ्य केंद्र /खेल का मैदान ,दुःख -सुख में भाग लेते पडोशी ,सभी घरों में पानी , बिजली ,गैस का कनेक्शन ! धर्मशाला , हर लोगों को काम और धंधा ! क्या आपके आँखों में भी सपने है ? क्या हमने बड़े सपने देखे ? कलाम साहेब कहते हैं की बड़े सपने देखो ,छोटा सपना देखना पाप है ! किया हमारे सपने पूरा नहीं हो सकता ? आखिर कियों ????
Friday, 11 May 2012
Thursday, 26 April 2012
शहर से गाँव गया अँधेरा पसरा था अभी रात के ८ भी नहीं बजे थे पर पूरी बस्ती निस्तब्ध थी लग रहा था सभी नींद के आगोश में हों कहीं कही टिमटिमाते हुआ मधिम राशनी आती थी ,घर पहुंचा और खाकर मैं भी सो गया ,थका था वरांडे पर बिछावन कर जैसे हीं लेता तो फिर सवेरे नीद खुली, पझी चहचहा रही थी ,सभी जगह जाग हो गयी थी फरीच होते हीं सभी का एकसाथ जागना मनमोह लेता है घरों के आँगन से धुयाँ उठ रही थी ,चूल्हे में आग दी जा रही थी , शौच आदि से निरविर्त होकर आँगन आया ,घर के लोगों से बातचीत की माल- मवेशी को चारा आदि दिया जा चूका था और सभी घर गृहस्ती ,खेत खलिहान के कार्यों में व्यस्त थे ,धुप ढलने को था सभी अपने अपने घरों को लौट रहे थे यह गोधुली बेला थी ,पहली साँझ में रौशनी दिखा कर एक आध घंटा में सभी खा पी कर बिछावन पर थे l अब तो Early to Raise or Early to Bed , Makes a man healthy , wealthy , & wise बच्चों को उपदेश देते हुए स्वयं अचरज आती है किया आज के ज़माने में इसे निभाया जा सकता है .is...
इसी तरह हमारी दिनचर्या ,खानपान ,लोक कला गुजरे ज़माने की बात हो गयी सब कुछ बाजार -शहर की भेंट चढ़ गयी हम बाजार के लिए मात्र उपभोगता हो गये ,दातुन टूथ ब्रश -पेस्ट की भेंट चढ़ गयी ,जाम में फंसी है जिन्दगी ,जीवन अपनी अर्थ खो चुकी ,अर्थ में फंसी है ,खान पान में दवाएं भी शामिल हो गयी है l
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